बुधवार, 23 सितंबर 2015

तराई मधेश की जायज़ माँग

एक बार फिर बात नेपाल की । आज नेपाल का तराई क्षेत्र धधक रहा है । चारों तरफ लोगों में गुस्सा है । लोग अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं । देश को नया संविधान जरूर मिला है । लेकिन उसकी खुशी नेपाल के एक बड़े भूभाग मे देखने को नहीं मिल रही है। पिछले दो दिनों में जनकपुर से लेकर विराटनगर तक में नए संविधान की प्रतियॉं जला कर विरोध किया गया है । देश की कुल जनसॅंख्या की आधी से ज्यादा आबादी इन तराई क्षेत्रों में बसती है । फिर भी इनकी आवाज संविधान निर्माताओं के कानों तक नहीं पहुॅंच पाई । आखिर क्या है इन मधेश वासियों की मॉंग ? और कितनी ज़ायज है इनकी मॉंग !

शुरू से ही तराई मधेश में रहने वाले लोग स्वायत मधेश प्रदेश की मॉंग कर रहे ​थे। नेपाल के 75 में से 22 जिलें तराई या समतल क्षेत्र में आता है । इन इलाकों मे नेपाल की आधी से ज्यादा आबादी गुजर बसर करती है। ये जिले भारत से सटे सीमा से लगे है। 1580 किलोमीटर लंबी भारत नेपाल सीमा में दोनों तरफ के लोगों में कई समानताऐं देखी जा सकती है । मसलन रहन—सहन,खान—पान,बोली,भाषा इत्यादी । शादी,विवाह भी इन इलाकों में धड़ल्ले से और बिना किसी शंका उपशंका के की जाती रही है । इसलिए यहॉं हम बेटी रोटी जैसे रिश्तों का बखान करते है । ये लोग इसी भाषा और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए एक मधेश एक प्रदेश की मॉग हमेशा से करते रहे हैं। लेकिन हमेशा से पहाड़ डोमिनेन्ट राजनीति ने मधेश वासियों की इस मॉंग को खारिज किया है । जब लोगों ने देखा कि इनकी ये मॉंग सहज पूरी नहीं कि जा सकती है तो ये लोग थोड़ा नरम हुए । तराई मधेश क्षेत्र में दो प्रदेश की मॉंग मनवाई गई । लेकिन इसमें भी विरोध के स्वर तब उठने लगे जब दक्षिण पूर्व के तीन जिले मोंरगं , झापा और सुनसरी को मधेश का हिस्सा नहीं बनाया गया । ठीक ऐसा ही दक्षिण पश्चिम के कुछ जिलों को थारूवान का हिस्सा नहीं बनाया गया । जबकि इन जिलों में रहने वाले लोग थारू जनजाती के है । जिनकी अपनी भाषा और समृद्ध संस्कृति है । ठीक उसी तरह जैसा मधेश में रहने वाले  मैथिली भोजपुरी भाषाई लोगों की है ।

दरअसल  विरोध के स्वर यहीं से उठना शुरू हुआ । यही वजह है कि पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ यह विरोध हिंसा का स्वरूप ले लिया । इस हिंसा ने अभी तक 40 से ज्यादा लोंगों की जानें ले ली है। आब बात विरोध के हिंसक होने की । पश्चिम नेपाल के कैलाली में जहॉं संविधान के विरोध में उठी आवाज सबसे पहले हिंसा का रूप ले लिया । यहॉं प्रहरी या पुलिस पहाड़ मूल के होने की एक बड़ी वजह थी जो यह झड़प इतना बड़ा रूप ले लिया । आज भी पहाड़ और मधेश की विभेदकारी नीति कहीं ना कहीं गाहे बगाहे अपना सर उठा ही लेती हैै। इसकी एक झलक यहॉं के नागरीकता या सिटीजनशिप में भी देखने को मिलती है।

नेपाल में शुरू से ही दो तरह के नागरिकता का प्रावधान है। एक अंगीकृत तो दूसरा वंशज । आंगीकृत नागरिकता का अर्थ है कि नागरिकता लेने वाला व्यक्ति अपने आधार पर अपने बच्चों या पत्नी को नागरिकता नहीं दिला सकता है । जबकि वंशज नागरिकताधारी व्यक्ति के बच्चे भी अपने बाप के नागकिरता का आधार बनाकर अपना नागरिकता बनबा सकता है । अंगीकृत नागरिकता वाला कोई व्यक्ति वहां सर्वाच्च संवैधानिक पद मसलन राष्टपति, सेनाध्यक्ष या न्यायाधीश नहीं बन सकता है। इस तरह के अंगीकृत ना​गरिकता वाले अधिकांश लोग इन्हीं तराई क्षेत्रों में बसते है । पहले नियम था कि वशंज नागरिकता के लिए मॉं ओर पिता दोनों को नेपाली होना आवश्यक था। लेकिन मधेसियों के विरोध के बाद नए संविधान में यह नियम बदला गया है । अब नागरिकता के लिए मॉ या पिता शब्द जोड़ा गया है । यानि की मॉ या बाप में से कोई एक भी नेपाली है तो उसके बच्चे को नागरिकता लेले में कठिनाई नहीं होगी । लेकिन मधेश के लोग अंगीकृत नागरिकता वाले को भी सभी तरह के अधिकार और सभी पदों पर बैठने को अधिकार मॉंग रहे हैं । जिसे नए संविधान मेंं नहीं रखा गया है । मुख्य रूप से ये दो मॉंग एसे हैं जो इन लोगों के द्वरा मुख्य रूप से उठाया गया है । खासकर राज्यों के सीमांकन और नामांकन मख्य मुद्दा है ।

संविधान जारी होने के बाद अब सरकार के लिए यह एक चुनौती है कि नए संविधान को सहज रूप से लागू किया जा सके । तराई मधेश में फैली हिंसा को रोकना भी अभी सरकार का मुख्य दायित्व है । हालांकि इसके लिए वार्ता का वातावरण बनाया जा रहा है । लेकिन इसमें सफलता कितनी मिलेगी फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी । 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

धधकता मधेश

पिछल दो सप्ताह से नेपाल के तराई क्षेत्र में हिंसा, बंद , आगजनी , हड़ताल और प्रदर्शन का क्रम जारी है। सोमवार को कैलाली के टीकापुर में जो हुआ वह प्रदर्शन के क्रम में किए गए हिंसा की चरम सीमा है । प्रदर्शनकारियों ने 17 से अधिक पुलिसकर्मियों को विभिन्न तरीके से मौत के घाट उतार दिया । बदले में सरकार ने सेना बुला ली और कर्फ्यु लागा दी । ना तो इस घटना के जड़ में जाने की सरकार ने जहमत उठाई, और ना ही समस्या के समाधान करने की कोई पहल । हॉं घटना की जॉंच के लिए एक कमेटी जरूर बना दी गई ।

नेपाल इन दिनों अपने संविधान निर्माण के दौर से गुजर रहा है। संविधान का प्रारभिंक मसौदा तैयार किया गया । कुछ बिंदुओ को छोड़कर लगभग अधिकांश मुद्दों पर प्रमुख तीन राजनीतिक दल कॉेग्रेस, एमाले और एमाओवादी सहमत दिखे । तराई को प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी मधशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक ने भी हॉं में हॉं मिलाई । इधर कुछ विरोध के बावजूद मसौदे में फेर बदल के बाद अब सात प्रदेश का खाका तैयार किया गया है । जिसे संविधान सभा में पेश भी कर दिया गया । बताते चलें कि इससे पहले मसौदे मे 6 प्रदेश के प्रारूप को शामिल किया गया था । एक तरफ संविधान सभा में मसौदे पर बहस शुरू हुई , तो दूसरी तरफ तराई मधेश में मसौदे का विरोध शुरू हुआ । तराई क्षेत्र को प्रतिनिधित्व करने वाले सभी मधेशी दल इस संविधान का विरोध कर रहें है। यही विरोध जब उग्र हुआ तो कैलाली की घटना ने जन्म लिया ।

नेपाल के 75 में से 22 जिला दक्षिणी क्षेत्र मधेश में आता है । यह क्षेत्र समतल भूमि वाला इलाक़ा है । इसलिए इसे तराई या मधेश कहा जाता है । क्योंकि समूचे नेपाल को भौगोलिक दृष्टीकोण से तीन हिस्सों में बॉंटा गया है । तराई,पहाड़ और हिमाल । नाम से ही आप इसका अर्थ लगा सकते है । बहरहाल हम बात कर रहे थे, तराई क्षेत्र की । दरअसल तराई वासी या मधेशी शुरू से ही एक मधेश एक प्रदेश की मॉंग कर रहे थे। लेकिन सरकार और प्रमुख राजनीतिक दल इस मॉंग को शुरू से ठूकरा रहें है । नतीजतन कुछ मधेशी दलों में सत्ता लोलुपता और आपसी फूट की वजह से यह मॉंग कमजोर होता गया । जिसका फायदा शीर्षस्थ राजनीतिक दलों ने उठाया। इसमें सांमती मानसिकता वाले कुछ ऐसे दल और नेता भी है, जो हमेशा से इन मेधशियों को दबा कुचला समझते आ रहे हैं। इन पर राज करने की इनकी मानसिकता आज भी व्याप्त है । दरअसल लड़ाई इसी मानसिकता को ख़त्म करने की है । लेकिन आपसी कलहबाजी और फूट ने इस लाड़ाई को समय समय पर कमजोर किया है ।

 नयॉं संविधान के मसौदे में तराई के कुछ जिले को बॉट कर दूसरे प्रदेश में शामिल किया गया है । कैलाली जो कि थारू बहुल इलाका है । भौगोलिक और जातिय पहचान मिटने के डर से यह समुदाय थारू प्रदशे की मॉंग पर अड़ा है । इनकी इस मॉंग को प्रस्तावित मसौदे मे संबोधन नहीं किया गया है । इसी का विरोध करने के लिए ये लोग कैलाली के टीकापुर में जगह जगह प्रदर्शन कर रहे थे । उग्र होते प्रदर्शन को जब पुलिस ने रोकना चाहा तब यह हिंसक रूप ले लिया । प्रदर्शनकारियों ने घरेलु हथियार से आक्रमण कर दिया । इस हमले मे एक एसएसपी स्तर के पुलिस सहित 17 पुलिसकर्मियों की जान चली गई । साथ ही तीन प्रदशकारी भी इस हमले में मारे गए । कुछ पुलिसकर्मी को विभत्स तरीके से आग लगा कर जला दिया गया । घटना के अगले दिन सरकार ने सेना का परिचालन कर स्थिति को काबू करने की कोशिश की । टीकापुर में कर्फ्यं लगा दिया गया। लोगों से शांती बनाए रखने की अपील की गई । लेकिन एसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ टीकापुर की है। कमोबेश यही स्थिति तराई के एक दर्जन से अधिक जिलों में व्याप्त है । अधिकांश जिलों में कर्फ्यु और प्रदर्शन जारी है । जिसे थमने की आशंका फिलहाल तो नहीं लग रही हैं।

इस बीच सरकार ने कैलाली घटना की जॉंच के लिए एक आयोग का गठन कर खाना पूर्ति का काम कर दिया है एक और बात, आपको याद होगा जब माओवादी आन्दोलन नेपाल मे चल रहा था , तब मधेश के सभी सरकारी कार्यलयो पर श्री 5 सरकार को मिटा कर मधेश सरकार लिखा जाने लगा था एक बार फिर वही स्थिति थारू बहुल क्षेत्र में देखने को मिल रहा है थरूहट इलाक़े मे थारूवान स्वायत प्रदेश लिखने का सिलसिला शुरू हो गया । यकीनन नेपाल इस समय पहाड़ी और मधेशी विभेद नीति का शिकार हो रहा है । 90 के दशक में इस सुंदर देश के ​अस्थिर होने का बहुत बड़ा कारण यह विभेद नीति ही था। वर्तमान मे आलम यह हो गया कि पहाड़ी सरकारी कर्मचारी मधेश में काम करने से कतरा रहा है, और मधेशी कर्मचारी पहाड़ मे नहीं जाना चाहता है । स्थिति विकराल होन से पहले से इससे निपटना प्रधानमंत्री सुशील कोइराला सरकार के लिए एक चुनौती है । संविधान निर्माण के राह में यह चुनौती सबसे बड़ी बाधा है ।  अगर इस आग को यहीं नहीं बुझाया गया तो विश्व को शांति का संदेश देने वाले यह देश बुरी तरह अशांति की आग में झुलस जाएगा

तराई आज जल रहा हैं । प्रदर्शन की आग में आम नागरिक झुलस रहें है। लेकिन सरकार संविधान निर्माण की प्रक्रिया से पीछे नहीं हटने की अपनी प्रतिबद्धता जता चुकी है । ऐसे में जरूरी है कि तराई मधेश के दलों को वार्ता के टेबल पर बुलाकर एक बीच का रास्ता निकाल जाय । अगर ऐसा नहीं होता है तो संविधान जारी होने के बाद भी मधेश शांत हो जाएगा इसकी गायरंटी देना फिलहाल तो जल्दबाजी होगी । क्योंकि वर्षों से विभेदकारी नीति का शिकार तराई वासी इस मौक़े को एक सुनहरा अवसर के तौर पर देख रहें है ।

सोमवार, 10 अगस्त 2015

सीमा पर बाड़ नहीं दीवार चाहिए


भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत लंबे समय तक अच्छे रिश्ते कभी नहीं रहे हैं । कुछ दिन या महिनों के बाद फिर कटू अनुभव भुगतने पड़ते है । एक अच्छे पड़ोसी के रूप में रखने और रहने की कल्पना मूर्त रूप ले नहीं पाती है । जब दोनों हुक्मरानों की राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रबल होती है हम ढ़ाई घर चलते हैं । पर निकलता कुछ नहीं है । वहीं ढाक के तीन पात । सीज फायर का उल्लंघन या भारतीय सरजंमी पर आतंकी हमले होते ही हम अपने पॉंव फिर वापस खींच लेते हैं । तब हम अपने आपको पाते है कि हम आज भी वहीं है जहॉं 68 साल पहले खड़े थे । आखिर क्यों नहीं हम इन सात दशकों मे विवादित मुद्दो को सुलझा पाए है ? कभी भारत का हिस्सा रहा पाकिस्तान आए दिन आॅंखे दिखता रहता है ? वक्त बेवक्त गीदरभभकी देता रहता है । क्यों पाकिस्तान की जमीन पर रची साजिश का अंजाम हमे भूगतना पड़ता है ? क्यों तीन तीन महायुद्ध का परिणाम भूगतने वाला पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आता है ?

हर दूसरे दिन सीमा पर गोली बारी होना इत्तेफाक नहीं है। सीमा पार से घूसपैठ करकार भारत के उतरी भूभाग में अशांती फैलाना पाकिस्तान की फितरत है । दरअसल पकिस्तान नहीं चाहता है कि दोनों देश के रिश्ते सुधरे । इसलिए जैसे तैसे वह कश्मीर और आतंकवाद के मूद्दे को हवा देता रहता है । यह बात किसी से छुपी नहीं है, कि पाकिस्तान में नाम मात्र का लोकतंत्र है । वहॉं आज भी शासन की बागडोर सेना संभालती है । खास कर भारत के मामले में यह बात कई बार साफ हो चुकी है । मसलन , उफा मे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा किया गया वादा 48 घंटे में बदल गया । रूस के उफा में नवाज शरीफ ने पधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुंबई हमले के मास्टर माइंड लखवी के आवाज की सेंपल देने की बात कही थी , लेकिन पाकिस्तान की जमीन पर कदम रखते ही शरीफ साहब की शराफत बदल गई । नवाज शरीफ के सुर बदल गए । चौतरफा आलोचना होने के बाद नवाज शरीफ शांत बैठ गए । फिर क्या था,उसके बाद बांकि का काम पाकिस्तानी सेना और आतंकवादी कर ही रहे है । यही है पाकिस्तान की हकीकत ।

परमाणू संपन्न देश पाकिस्तान किसी मायने में अपने आप को भारत के कम नहीं आंकता है । हर बात पर परमाणू बम से लैस होने की धमकी देता रहता है । उसकी बड़ी वजह है कि हर युद्ध के बाद हमने उसे कोई ​बड़ा सबक नहीं सिखाया ।  ना तो हमने पाकिस्तानी जमीन हड़पी और ना ही उसके परमाणू ठिकानों और प्रमुख प्रतिष्ठानों को नष्ट किया । दरअसल वह हर क्षेत्र मे भारत की बराबरी करना चाहता है । जो संभव नहीं है । यही वजह है कि पाकिस्तान भारत से जलता है । और यही तपन उसे साम्य संबध बनाने से रोकता है ।

लातों के देवता बातों से नहीं मानता । इन 68 सालों में इतना तो भारत को समझ लेना चाहिए । भारत पाकिस्ताना का मसला इतना आसान भी नहीं है जितना समझा जाता है । दरअसल दोनों देशों के बीच सेंटीमेंट का भी मसला जूड़ा है । आप टीवी पर दोनो तरफ के रक्षा विशेषज्ञों की बहस देख लिजिए । लगता है जैसे अब लड़ पड़ेगें । यह मसला हर भारतीय और पाकिस्तानी के दिलों को छूता है । ऐसे में जरूरी है कि पहले उन मसलों को सुलझाया जाय । जैसे जम्मू कश्मीर का मसला । फिर आंतकवाद का मुद्दा सुलझने वाला है। जब तक पाकिस्तानी सेना या वहॉं की हुकूमत जम्मू ​कश्मीर से अपना दावा करता रहेगा तब तक किसी भी सूरत में दोनों देश के संबध अच्छे नहीं हो सकते ।

मुॅंह​ में राम बगल में छूरी । पाकिस्तानियों का मूल मंत्र यही है । हम जब बात करते है , तो सिर्फ बात करते है । ताकि हम एक अच्छे पड़ोसी की तरह रह सकें । लेकिन पाकिस्तान जब बात करता है तब उसका ध्यान कहीं और रहता है । वह सिर्फ अंतराष्ट्रीय समुदाय को दिखाने के लिए बात करता है । डायलॉग का दिखावा करता है । आज पाकिस्तान अपने अंदरूनी हालात से खुद लड़ रहा है । फिर भी सीमा पर लड़ाई करने के लिए आतुर है । इधर ​सीमा पर कुछ दिनों से जारी गोलीबारी इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान कश्मीर मूदृे को अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुख़ियों मे रखना चाहता है ।


पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार कठपूतली है । चाह कर भी वह भारत से अच्छे रिश्ते नहीं रख सकती है । क्योंकि उन्हें सेना और आइएसआई ऐसा नहीं करने देती है । उन्हें उच्छी तरह से पता है कि अगर ऐसा हो गया तो पाकिस्तान में उनकी ताक़त घट जाएगी । सेना , आईएसआई और सरकार की इसी टकराव की वजह है कि वहॉं आतंकवाद अपनी जड़े जमा चुका है । इसलिए भारत के ​​हित में यही होगा कि वह बातचीत छोड़कर चीन की तरह अपनी सीमाओं की ​दिवार इतनी उॅंची करले कि 'आ ना पाए उधर से दूश्मन कोई ' ।  

रविवार, 28 जून 2015

सफलता संसाधनो की मोहताज नहीं

 इंजीनियर बनना अब अमीरों और धन्ना सेठों की जागीर नहीं रही। गॉव से निकले युवा भी अब इंजीनियर बनने लगे है। पिछले कुछ सालो में ग्रामीण और गरीब युवाओ ने यह साबित किया है। एक मजदूर का बेटा बेटी इंजीनियर बनने के अपने सपने को पूरा कर रहा है। इन सपनो को पूरा करने में जहाँ उनकी लगन , मेहनत का कमल है , वहीं कुछ ऐसे संस्थान है जो उन्हें इंजीनियर बनने के रास्ते में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं ।

एक वक्त था , जब इंजीनियर बनना गरीब घर के बच्चे सोच भी नहीं सकते थे। गांव की गलियों में गुल्ली  डंडा खेल कर बड़ा होने वाले बच्चे सपने में भी इंजीनियर बनने का सपना नहीं देखते थे। यही सोच कमोबेश अभिभावकों की भी थी।  धीरे धीर वक्त बदला और ग्रामीण बच्चो की सोच बदली। वो भी बड़े सपने देखने लगे। उन्हें भी अपने अन्दर की प्रतिभा को समझने और परखने का मौक़ा मिलने लगा।  उन्हें भी लगा की इंजीनियर बनने के लिए अमीर होना जरुरी नहीं है। कुछ जरुरी है, तो वो है कड़ी मेहनत और इमान्दारिता। क्योंकि इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए मोटे मोटे फीस वाले संस्थान की जगह अब काम फीस और मुफ्त में तैयारी कराने वाले संस्थान देेश में मौजूद है। बस जरुरी है, आप में वो प्रतिभा होनी चाहिए।

बिहार के गया जिले के मानपुर पटवा टोले के 18 युवाओ ने इसबार IIT  का एंट्रेंस पास किया है। इन लोगों की घर की सालाना कमाई 25000 से लेकर 90000 तक है। फिर भी इनलोगों ने अपनी आर्थिक स्थिति को सफलता की राह में रोड़ा नहीं बनने दिया। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के दो भाइयों ने इंजीनिरिंग की परीक्षा पास की है। इनके पिता मिल में मजदूर है। ये मेधावी छात्रों साबित किया है की सफलता संसाधनो की मोहताज नहीं है। अगर लगन और कुछ करने की इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। इस बार के IIT एंट्रेंस का परिणाम देखेंगे तो ऐसे कई उदाहरण आपको मिल जाएंगे।

अब बात करते है , उन संस्थानों की जो इनके सपने को पूरा करने कोई कसर नहीं छोड़ते है। मसलन पटना में आनद कुमार द्वारा चलाया जा रहा सुपर 30 संस्थान। धीरे धीरे ऐसे और कई संस्थान अब खुलने लगे है। ये कोचिंग सेन्र्टर प्रतिभावान गरीब बच्चों को कम फीस या मुफ्त में इन्हे एंट्रेंस की तैयारी कराते है। जिसके बाद ये बच्चे मिसाल कायम करते है, और बाकि बच्चों के लिए आदर्श बन रहे है। इसलिए कहते है, प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती है।  

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

सम्पादकीय में घुसपैठ

पत्रकारिता का स्तर दिनोदिन घटता ही जा रहा है। एक वक्त था , जब पत्रकार और उनकी रिपोर्ट तटस्थ  हुआ करती थी। आज पत्रकरिता पर चौतरफा ऊँगली उठ रही है। खास कर टीवी पत्रकारिता निशाने पर है।  विज़ुअल मीडियम सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इसकी वजह क्या है? क्यों टेलीविज़न में सम्पादकीय स्वतंत्र नहीं है ? क्यों ख़बरों में पक्षपात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिख ही जाता है ?

कहते है कि रिपोर्टर वही दिखाता  है जो घटता है। लेकिन ये बहुत हद तक अब कहने  और सुनने तक सिमट कर रह गया है। हम टीवी पत्रकार भलीभांति समझते है कि टीवी स्क्रीन पर वही दिखता है जो हम दिखाना चाहते है। और हम दिखाना वही चाहते है जिसका आदेश हमें ऊपर बैठे आकाओ से मिलता है। इन आकाओ के ऊपर भी कोई है जिन्हें इन्होने न्यूज़ चैनल खोलते वक्त मोटा मुनाफा कमाने का सब्जबाग दिखया था। इसी सब्जबाग को हकीकत बनाने के लिए चैनलों को राजनीतिक दलों से लेकर उद्योगपतियों तक के आगे नतमस्तक होना पड़ता है। यही से शुरु होती है न्यूज़ चैनल के सम्पादकीय में घुसपैठ।