पत्रकारिता का स्तर दिनोदिन घटता ही जा रहा है। एक वक्त था , जब पत्रकार और उनकी रिपोर्ट तटस्थ हुआ करती थी। आज पत्रकरिता पर चौतरफा ऊँगली उठ रही है। खास कर टीवी पत्रकारिता निशाने पर है। विज़ुअल मीडियम सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इसकी वजह क्या है? क्यों टेलीविज़न में सम्पादकीय स्वतंत्र नहीं है ? क्यों ख़बरों में पक्षपात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दिख ही जाता है ?
कहते है कि रिपोर्टर वही दिखाता है जो घटता है। लेकिन ये बहुत हद तक अब कहने और सुनने तक सिमट कर रह गया है। हम टीवी पत्रकार भलीभांति समझते है कि टीवी स्क्रीन पर वही दिखता है जो हम दिखाना चाहते है। और हम दिखाना वही चाहते है जिसका आदेश हमें ऊपर बैठे आकाओ से मिलता है। इन आकाओ के ऊपर भी कोई है जिन्हें इन्होने न्यूज़ चैनल खोलते वक्त मोटा मुनाफा कमाने का सब्जबाग दिखया था। इसी सब्जबाग को हकीकत बनाने के लिए चैनलों को राजनीतिक दलों से लेकर उद्योगपतियों तक के आगे नतमस्तक होना पड़ता है। यही से शुरु होती है न्यूज़ चैनल के सम्पादकीय में घुसपैठ।
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