मैं जो सोचता हूॅं, वो लिखता हूॅं । इस ब्लॉग के द्वारा आप से कुछ विचार बॉंटने की इच्छा रखता हूॅं। आपके कमेंट से कुछ सीखने की ललक हमेशा रहती है।
बुधवार, 18 मार्च 2009
मौत करीब देख जीने की तमन्ना होती है।
इससे हंसी मौत और कौन सी हो सकती है। जीने का तो सबको पता होता है, लकिन मौत कब दरवाजे पर दस्तक देगी शायद किसी को नहीं मालूम । विरले ही कोई होता है जिसे इस हसीन दूनिया से जाने का वक्त पता होता है। उन्हीं बदनसीबों में से एक है, जेड गुडी । मौत को क़रीब से देखने वालो कि ये तमन्ना होती है कि कोई उसे कहीं ऐसे जगह छुपा दे जहाँ कि ख़बर यमराज को ना हो। जैसे पूलिस से बचने के लिए चोर छिपा करता हैं। भले लोक कहें कि मै सिर पर कफ़न बाíध कर चला हुं। आप इस बात से इत्तेफ़ाक रखे या ना लेकिन मेरा मानना है कि किसी मे इतनी ताकत ओर साहस नहीं जो निकलते हुए सांसो का सामना कर सके। मैनें बहुत करीब से मौत को देखा है । जब मरने कि बारी आती है तो लोग जीना चाहते शायद कोई तमन्ना होती है जो अभी भी बांकि है। कोई सपना है जो अपनी आँखो से पूरी होते हुए देखना चाहता हो । जेड गुडी अपनी सारी इच्छाओं को पूरा कर के मर रही हैं। अब वो आसानी से मौत को गले लगा सकेगी । लकिन इस तरह कि मृत्यु कितने लोगों कि होती है। जरा सोचिए कोन ज्यादा खुशकिस्मत है , जेड गुडी या वो जिसे एक झटके मे इस दुनिया से जाना होता है ? फ़र्क सिर्फ इतना है कोई सपने पूरे करके यहाí से विदा होता ता कोई सपना पूरा नहीं करने का मलाल लिए इस रंगीन दूनिया से रूख़सत हो जाता है।
मंगलवार, 17 मार्च 2009
तीसरे मोर्चे की चहलकदमी
12 मार्च को कर्नाटक के तुमकुर में आयोजित एक जनसभा में तीसरे मोर्चे की नई नीवं रखी गई । लोकसभा चुनाव से ऐन पहले क्षेत्रीय दलो का एकजुट होना निश्चित तौर पर दोनो प्रमुख गठबंधन राजग और यूपीए के लिए चिंता का सबब है। ये अलग बात है कि दोनों पार्टियों के नेता भले ही अपने चेहरे के हाव-भाव से अपनी परेशानियो को छुपा लें, लेकिन तीसरे मोर्चे के प्रति क्षेत्रीय पार्टियों के बढते मोह कांग्रेस और बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। फिलहाल तो तुमकुर में देश के आठ पार्टियों ने हाथ मिलाया हैं। लेकिन बसपा और बीजद के शामिल होने से चुनाव के बाद जोड़ तोड़ कि राजनीति में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। उधर जेडीएस अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने नवीन पटनायक की बीजद की भी तीसरे मोर्चे मे शामिल होने की सहमती पर मोहर लागाई है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), फॉरवर्ड ब्लाक, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया(आरपीआई), तेलगुदेशम पार्टी(टीडीपी), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), अन्नाद्रुमक(एआईडीएमके), और जनता दल सेकुलर, ये आठ दल फिलहाल तीसरे मोर्चे में हैं। लेकिन जिस तरह तुमकुर के जनसभा में बसपा के बरिष्ट नेता और सांसद सतीश चन्द्र मिश्र ने अपनी मौजदूगी दर्ज करायी उससे ये संकेत मिल रहें हैं कि आने वाले दिनों मे बसपा सुप्रीमों मायावती प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना को पूरा करने के ख्याल से तीसरे मोर्चे कि साझेदार बने तो इसमे किसी को आश्चर्य नहीं होनी चाहिए । हलांकि मायावती की ये इच्छा लोकसभा चुनाव मे बसपा के हिस्से आने वाली सीटों पर निर्भर करता है। क्योंकि कांशी राम के जन्म दिन पर मिले तीसरे मोर्चे के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव बाद करने पर सहमति जताई है। लाजिमी है नेता वही होगा जिसके पास ज्यादा सांसद होगें । अगर देखा जाय तो देश मे अब तीन ऐसे गठबंधन है जो चुनाव बाद सरकार बनाने कि स्थिति मे होगें ।
जंहा तक प्रधानमंत्री की बात है तो एनडीए लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर चुनाव लड़ेगी तो यूपीए में अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है, और तीसरा मोर्चा चुनाव बाद तय करेगा । लिहाजा मायावती को प्रधानमंत्री बनने के लिए गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभर कर आना होगा। वैसे देखा जाय तो अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि तीसरे मोर्चे कि सरकार देश में कभी सफल नहीं हो पाई है। यहि वजह है कि सफलता और असफलता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश कि जनता मानसिक रूप से इस स्थिति में है जो अपना मत द्विधुव्रीय राजनीति से इतर तीसरा मोर्चा को दे सके ?
भारतीय राजनीति मे अब सिद्धांत और वसूलों कि बाते ना हि करें तो अच्छा होगा। सभी राजनीति दल अपने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए और सरकार बनाने के लिए जब जहां जैसे बन पड़ा अलग अलग विचारधाराओं वाले दलों से हाथ मिलाती रही हैं। इसलिए ये कहना कि तीसरे मोर्चे का क्या सिद्धांत होगा और देश का कौन सा वर्ग इसे वोट देगी कहना मुश्किल है। जंहा जांत, पांत , क्षेत्रवाद , बाहुबली और धन के बल पर संसद के गलियारे मे जाया जा सकता है, वहां राजनीतिक दलो कि विचारधारा धरी कि धरी रह जाती है । हां पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मतदातोओं में जागरूकता आई है। जिसे हमने विगत विधानसभा चुनाव में देखा है। जनता अब जाग उठी है, उसे अपने अधिकारो का ज्ञान हो रहा है , विकास करने वाल नेता और दलों को वो अच्छी तरह पहचानती है। कौन सी पार्टी कितने सीट जीतेगी, फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। क्योंकि भैया यह लोकतंत्र का महापर्व है जिसमें आखिर सबकुछ देश कि जनता के मुट्ठी में है। जिधर ये मुट्ठी खुल जाय उसके वारे न्यारे और जिधर ये बंद हो जाय उनके जमानत जब्त। क्योंकि भैया ये पब्लिक है पब्लिक जो सब जानती है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), फॉरवर्ड ब्लाक, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया(आरपीआई), तेलगुदेशम पार्टी(टीडीपी), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), अन्नाद्रुमक(एआईडीएमके), और जनता दल सेकुलर, ये आठ दल फिलहाल तीसरे मोर्चे में हैं। लेकिन जिस तरह तुमकुर के जनसभा में बसपा के बरिष्ट नेता और सांसद सतीश चन्द्र मिश्र ने अपनी मौजदूगी दर्ज करायी उससे ये संकेत मिल रहें हैं कि आने वाले दिनों मे बसपा सुप्रीमों मायावती प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना को पूरा करने के ख्याल से तीसरे मोर्चे कि साझेदार बने तो इसमे किसी को आश्चर्य नहीं होनी चाहिए । हलांकि मायावती की ये इच्छा लोकसभा चुनाव मे बसपा के हिस्से आने वाली सीटों पर निर्भर करता है। क्योंकि कांशी राम के जन्म दिन पर मिले तीसरे मोर्चे के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव बाद करने पर सहमति जताई है। लाजिमी है नेता वही होगा जिसके पास ज्यादा सांसद होगें । अगर देखा जाय तो देश मे अब तीन ऐसे गठबंधन है जो चुनाव बाद सरकार बनाने कि स्थिति मे होगें ।
जंहा तक प्रधानमंत्री की बात है तो एनडीए लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर चुनाव लड़ेगी तो यूपीए में अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है, और तीसरा मोर्चा चुनाव बाद तय करेगा । लिहाजा मायावती को प्रधानमंत्री बनने के लिए गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभर कर आना होगा। वैसे देखा जाय तो अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि तीसरे मोर्चे कि सरकार देश में कभी सफल नहीं हो पाई है। यहि वजह है कि सफलता और असफलता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश कि जनता मानसिक रूप से इस स्थिति में है जो अपना मत द्विधुव्रीय राजनीति से इतर तीसरा मोर्चा को दे सके ?
भारतीय राजनीति मे अब सिद्धांत और वसूलों कि बाते ना हि करें तो अच्छा होगा। सभी राजनीति दल अपने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए और सरकार बनाने के लिए जब जहां जैसे बन पड़ा अलग अलग विचारधाराओं वाले दलों से हाथ मिलाती रही हैं। इसलिए ये कहना कि तीसरे मोर्चे का क्या सिद्धांत होगा और देश का कौन सा वर्ग इसे वोट देगी कहना मुश्किल है। जंहा जांत, पांत , क्षेत्रवाद , बाहुबली और धन के बल पर संसद के गलियारे मे जाया जा सकता है, वहां राजनीतिक दलो कि विचारधारा धरी कि धरी रह जाती है । हां पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मतदातोओं में जागरूकता आई है। जिसे हमने विगत विधानसभा चुनाव में देखा है। जनता अब जाग उठी है, उसे अपने अधिकारो का ज्ञान हो रहा है , विकास करने वाल नेता और दलों को वो अच्छी तरह पहचानती है। कौन सी पार्टी कितने सीट जीतेगी, फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। क्योंकि भैया यह लोकतंत्र का महापर्व है जिसमें आखिर सबकुछ देश कि जनता के मुट्ठी में है। जिधर ये मुट्ठी खुल जाय उसके वारे न्यारे और जिधर ये बंद हो जाय उनके जमानत जब्त। क्योंकि भैया ये पब्लिक है पब्लिक जो सब जानती है।
गुरुवार, 5 मार्च 2009
पाकिस्तान कि जमीन पर आतंक कि लहलहाती फसल ........
३ मार्च कि सुबह श्रीलंकाई खिलाडियो पर हुए आतंकी हमले को कई मायने में देखने कि जरुरत है ! पहला किसी भी देश के खिलाडियो पर इस तरह की यह पहली वारदात है ! दूसरा विदेशी खिलाडियो पर ही यह आक्रमण क्यों हुआ ! तीसरा इस घटना के बाद विश्व विरादरी में पाकिस्तान को देखने का नजरिये में किस तरह का बदलाव आयेगा ! सबसे अन्तिम और चोअथा यह की इस घटना को अंजाम देनेवाले वो हाथ कोन से है जो एक तीर से कई शिकार करना चाहते है !
क्रिकेट खिलाडिओं पर इस तरह की घटना की सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती थी ! लेकिन इस घटना ने उस कल्पना को भी मूर्त रूप दे दिया ! पाकिस्तानी क्रिकेट तो बर्बाद हुई ही साथ में जैसे भाईचारे का संदेश देने वाले इस खेल का भविष्य भी पाकिस्तान में फिलहाल तो खत्म होता दिख रहा है ! हलाकि इस गह्तना के बाद श्रीलंकाई खिलाडियो ने जो जिजीविषा दिखलाई वो सलाम करने योग्य है ! लेकिन इस सब के बीच जो सवाल बार बार कचोटता है वह यह की यह आक्रमण विदेशी खिलाडियो पर और पाकिस्तान में ही क्यों कि गई ! जाहिर सी बात है पाकिस्तान पुरे विश्व में आतंक का अड्डा बन चुका है , जहाँ कि लोकतान्त्रिक सरकार इसके आगे नतमस्तक है ! १६ फ़रवरी को स्वात घाटी में शरीअत कानून लागु करने के सरकारी समर्थन से इस बात कि पुष्टि होती है ! निश्चित तोर पर पाकिस्तान में लहलहा रही आतंक कि फसल से विश्व विरादरी चिंतित है ! विश्व विरादरी में यही चिंता पाकिस्तान में बैठे आतंक के उन आकाओं के लिए खुशी कि बात है , जिन्होंने इस गह्तन को अंजाम दिया है !
आई एस आई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल भले ही अपने बयान में इस घटना के लिए भारतीय एजेंसी रा को जिम्मदार ठहराए लेकिन, सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी फोअज द्वारा समर्थित इन आतंकवादियो के सहारे वंहा कि फोअजी ताकत एक बार फिर इतिहास दोहराने के को बेताब हो रही है ! इस उद्देश्य कि पूर्ति के लिए सबसे पहले तो सरकार और कानून व्यवस्था को नाकारा साबित करना होगा ! दूसरा देश के आर्थिक ढाचा को तोड़ना होगा ! और तीसरा विश्व विरादरी में पाकिस्तान के राजनयिक संबधों में खटास पैदा करना होगा ! और यह कहना नही पड़ेगा कि इस तरह के घटनाओ से ये सरे मनसूबे पुरे होते दिख रहे है !
क्रिकेट खिलाडिओं पर इस तरह की घटना की सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती थी ! लेकिन इस घटना ने उस कल्पना को भी मूर्त रूप दे दिया ! पाकिस्तानी क्रिकेट तो बर्बाद हुई ही साथ में जैसे भाईचारे का संदेश देने वाले इस खेल का भविष्य भी पाकिस्तान में फिलहाल तो खत्म होता दिख रहा है ! हलाकि इस गह्तना के बाद श्रीलंकाई खिलाडियो ने जो जिजीविषा दिखलाई वो सलाम करने योग्य है ! लेकिन इस सब के बीच जो सवाल बार बार कचोटता है वह यह की यह आक्रमण विदेशी खिलाडियो पर और पाकिस्तान में ही क्यों कि गई ! जाहिर सी बात है पाकिस्तान पुरे विश्व में आतंक का अड्डा बन चुका है , जहाँ कि लोकतान्त्रिक सरकार इसके आगे नतमस्तक है ! १६ फ़रवरी को स्वात घाटी में शरीअत कानून लागु करने के सरकारी समर्थन से इस बात कि पुष्टि होती है ! निश्चित तोर पर पाकिस्तान में लहलहा रही आतंक कि फसल से विश्व विरादरी चिंतित है ! विश्व विरादरी में यही चिंता पाकिस्तान में बैठे आतंक के उन आकाओं के लिए खुशी कि बात है , जिन्होंने इस गह्तन को अंजाम दिया है !
आई एस आई के पूर्व प्रमुख हामिद गुल भले ही अपने बयान में इस घटना के लिए भारतीय एजेंसी रा को जिम्मदार ठहराए लेकिन, सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी फोअज द्वारा समर्थित इन आतंकवादियो के सहारे वंहा कि फोअजी ताकत एक बार फिर इतिहास दोहराने के को बेताब हो रही है ! इस उद्देश्य कि पूर्ति के लिए सबसे पहले तो सरकार और कानून व्यवस्था को नाकारा साबित करना होगा ! दूसरा देश के आर्थिक ढाचा को तोड़ना होगा ! और तीसरा विश्व विरादरी में पाकिस्तान के राजनयिक संबधों में खटास पैदा करना होगा ! और यह कहना नही पड़ेगा कि इस तरह के घटनाओ से ये सरे मनसूबे पुरे होते दिख रहे है !
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