12 मार्च को कर्नाटक के तुमकुर में आयोजित एक जनसभा में तीसरे मोर्चे की नई नीवं रखी गई । लोकसभा चुनाव से ऐन पहले क्षेत्रीय दलो का एकजुट होना निश्चित तौर पर दोनो प्रमुख गठबंधन राजग और यूपीए के लिए चिंता का सबब है। ये अलग बात है कि दोनों पार्टियों के नेता भले ही अपने चेहरे के हाव-भाव से अपनी परेशानियो को छुपा लें, लेकिन तीसरे मोर्चे के प्रति क्षेत्रीय पार्टियों के बढते मोह कांग्रेस और बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। फिलहाल तो तुमकुर में देश के आठ पार्टियों ने हाथ मिलाया हैं। लेकिन बसपा और बीजद के शामिल होने से चुनाव के बाद जोड़ तोड़ कि राजनीति में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। उधर जेडीएस अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा ने नवीन पटनायक की बीजद की भी तीसरे मोर्चे मे शामिल होने की सहमती पर मोहर लागाई है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम), फॉरवर्ड ब्लाक, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया(आरपीआई), तेलगुदेशम पार्टी(टीडीपी), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), अन्नाद्रुमक(एआईडीएमके), और जनता दल सेकुलर, ये आठ दल फिलहाल तीसरे मोर्चे में हैं। लेकिन जिस तरह तुमकुर के जनसभा में बसपा के बरिष्ट नेता और सांसद सतीश चन्द्र मिश्र ने अपनी मौजदूगी दर्ज करायी उससे ये संकेत मिल रहें हैं कि आने वाले दिनों मे बसपा सुप्रीमों मायावती प्रधानमंत्री बनने की तमन्ना को पूरा करने के ख्याल से तीसरे मोर्चे कि साझेदार बने तो इसमे किसी को आश्चर्य नहीं होनी चाहिए । हलांकि मायावती की ये इच्छा लोकसभा चुनाव मे बसपा के हिस्से आने वाली सीटों पर निर्भर करता है। क्योंकि कांशी राम के जन्म दिन पर मिले तीसरे मोर्चे के सभी नेताओं ने प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव बाद करने पर सहमति जताई है। लाजिमी है नेता वही होगा जिसके पास ज्यादा सांसद होगें । अगर देखा जाय तो देश मे अब तीन ऐसे गठबंधन है जो चुनाव बाद सरकार बनाने कि स्थिति मे होगें ।
जंहा तक प्रधानमंत्री की बात है तो एनडीए लालकृष्ण आडवाणी को आगे कर चुनाव लड़ेगी तो यूपीए में अभी तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठ रही है, और तीसरा मोर्चा चुनाव बाद तय करेगा । लिहाजा मायावती को प्रधानमंत्री बनने के लिए गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी के रूप मे उभर कर आना होगा। वैसे देखा जाय तो अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि तीसरे मोर्चे कि सरकार देश में कभी सफल नहीं हो पाई है। यहि वजह है कि सफलता और असफलता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश कि जनता मानसिक रूप से इस स्थिति में है जो अपना मत द्विधुव्रीय राजनीति से इतर तीसरा मोर्चा को दे सके ?
भारतीय राजनीति मे अब सिद्धांत और वसूलों कि बाते ना हि करें तो अच्छा होगा। सभी राजनीति दल अपने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए और सरकार बनाने के लिए जब जहां जैसे बन पड़ा अलग अलग विचारधाराओं वाले दलों से हाथ मिलाती रही हैं। इसलिए ये कहना कि तीसरे मोर्चे का क्या सिद्धांत होगा और देश का कौन सा वर्ग इसे वोट देगी कहना मुश्किल है। जंहा जांत, पांत , क्षेत्रवाद , बाहुबली और धन के बल पर संसद के गलियारे मे जाया जा सकता है, वहां राजनीतिक दलो कि विचारधारा धरी कि धरी रह जाती है । हां पिछले कुछ वर्षों में भारतीय मतदातोओं में जागरूकता आई है। जिसे हमने विगत विधानसभा चुनाव में देखा है। जनता अब जाग उठी है, उसे अपने अधिकारो का ज्ञान हो रहा है , विकास करने वाल नेता और दलों को वो अच्छी तरह पहचानती है। कौन सी पार्टी कितने सीट जीतेगी, फिलहाल कहना जल्दबाजी होगी। क्योंकि भैया यह लोकतंत्र का महापर्व है जिसमें आखिर सबकुछ देश कि जनता के मुट्ठी में है। जिधर ये मुट्ठी खुल जाय उसके वारे न्यारे और जिधर ये बंद हो जाय उनके जमानत जब्त। क्योंकि भैया ये पब्लिक है पब्लिक जो सब जानती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें