एक बार फिर बात नेपाल की । आज नेपाल का तराई क्षेत्र धधक रहा है । चारों तरफ लोगों में गुस्सा है । लोग अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं । देश को नया संविधान जरूर मिला है । लेकिन उसकी खुशी नेपाल के एक बड़े भूभाग मे देखने को नहीं मिल रही है। पिछले दो दिनों में जनकपुर से लेकर विराटनगर तक में नए संविधान की प्रतियॉं जला कर विरोध किया गया है । देश की कुल जनसॅंख्या की आधी से ज्यादा आबादी इन तराई क्षेत्रों में बसती है । फिर भी इनकी आवाज संविधान निर्माताओं के कानों तक नहीं पहुॅंच पाई । आखिर क्या है इन मधेश वासियों की मॉंग ? और कितनी ज़ायज है इनकी मॉंग !
शुरू से ही तराई मधेश में रहने वाले लोग स्वायत मधेश प्रदेश की मॉंग कर रहे थे। नेपाल के 75 में से 22 जिलें तराई या समतल क्षेत्र में आता है । इन इलाकों मे नेपाल की आधी से ज्यादा आबादी गुजर बसर करती है। ये जिले भारत से सटे सीमा से लगे है। 1580 किलोमीटर लंबी भारत नेपाल सीमा में दोनों तरफ के लोगों में कई समानताऐं देखी जा सकती है । मसलन रहन—सहन,खान—पान,बोली,भाषा इत्यादी । शादी,विवाह भी इन इलाकों में धड़ल्ले से और बिना किसी शंका उपशंका के की जाती रही है । इसलिए यहॉं हम बेटी रोटी जैसे रिश्तों का बखान करते है । ये लोग इसी भाषा और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए एक मधेश एक प्रदेश की मॉग हमेशा से करते रहे हैं। लेकिन हमेशा से पहाड़ डोमिनेन्ट राजनीति ने मधेश वासियों की इस मॉंग को खारिज किया है । जब लोगों ने देखा कि इनकी ये मॉंग सहज पूरी नहीं कि जा सकती है तो ये लोग थोड़ा नरम हुए । तराई मधेश क्षेत्र में दो प्रदेश की मॉंग मनवाई गई । लेकिन इसमें भी विरोध के स्वर तब उठने लगे जब दक्षिण पूर्व के तीन जिले मोंरगं , झापा और सुनसरी को मधेश का हिस्सा नहीं बनाया गया । ठीक ऐसा ही दक्षिण पश्चिम के कुछ जिलों को थारूवान का हिस्सा नहीं बनाया गया । जबकि इन जिलों में रहने वाले लोग थारू जनजाती के है । जिनकी अपनी भाषा और समृद्ध संस्कृति है । ठीक उसी तरह जैसा मधेश में रहने वाले मैथिली भोजपुरी भाषाई लोगों की है ।
दरअसल विरोध के स्वर यहीं से उठना शुरू हुआ । यही वजह है कि पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ यह विरोध हिंसा का स्वरूप ले लिया । इस हिंसा ने अभी तक 40 से ज्यादा लोंगों की जानें ले ली है। आब बात विरोध के हिंसक होने की । पश्चिम नेपाल के कैलाली में जहॉं संविधान के विरोध में उठी आवाज सबसे पहले हिंसा का रूप ले लिया । यहॉं प्रहरी या पुलिस पहाड़ मूल के होने की एक बड़ी वजह थी जो यह झड़प इतना बड़ा रूप ले लिया । आज भी पहाड़ और मधेश की विभेदकारी नीति कहीं ना कहीं गाहे बगाहे अपना सर उठा ही लेती हैै। इसकी एक झलक यहॉं के नागरीकता या सिटीजनशिप में भी देखने को मिलती है।
नेपाल में शुरू से ही दो तरह के नागरिकता का प्रावधान है। एक अंगीकृत तो दूसरा वंशज । आंगीकृत नागरिकता का अर्थ है कि नागरिकता लेने वाला व्यक्ति अपने आधार पर अपने बच्चों या पत्नी को नागरिकता नहीं दिला सकता है । जबकि वंशज नागरिकताधारी व्यक्ति के बच्चे भी अपने बाप के नागकिरता का आधार बनाकर अपना नागरिकता बनबा सकता है । अंगीकृत नागरिकता वाला कोई व्यक्ति वहां सर्वाच्च संवैधानिक पद मसलन राष्टपति, सेनाध्यक्ष या न्यायाधीश नहीं बन सकता है। इस तरह के अंगीकृत नागरिकता वाले अधिकांश लोग इन्हीं तराई क्षेत्रों में बसते है । पहले नियम था कि वशंज नागरिकता के लिए मॉं ओर पिता दोनों को नेपाली होना आवश्यक था। लेकिन मधेसियों के विरोध के बाद नए संविधान में यह नियम बदला गया है । अब नागरिकता के लिए मॉ या पिता शब्द जोड़ा गया है । यानि की मॉ या बाप में से कोई एक भी नेपाली है तो उसके बच्चे को नागरिकता लेले में कठिनाई नहीं होगी । लेकिन मधेश के लोग अंगीकृत नागरिकता वाले को भी सभी तरह के अधिकार और सभी पदों पर बैठने को अधिकार मॉंग रहे हैं । जिसे नए संविधान मेंं नहीं रखा गया है । मुख्य रूप से ये दो मॉंग एसे हैं जो इन लोगों के द्वरा मुख्य रूप से उठाया गया है । खासकर राज्यों के सीमांकन और नामांकन मख्य मुद्दा है ।
संविधान जारी होने के बाद अब सरकार के लिए यह एक चुनौती है कि नए संविधान को सहज रूप से लागू किया जा सके । तराई मधेश में फैली हिंसा को रोकना भी अभी सरकार का मुख्य दायित्व है । हालांकि इसके लिए वार्ता का वातावरण बनाया जा रहा है । लेकिन इसमें सफलता कितनी मिलेगी फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी ।
शुरू से ही तराई मधेश में रहने वाले लोग स्वायत मधेश प्रदेश की मॉंग कर रहे थे। नेपाल के 75 में से 22 जिलें तराई या समतल क्षेत्र में आता है । इन इलाकों मे नेपाल की आधी से ज्यादा आबादी गुजर बसर करती है। ये जिले भारत से सटे सीमा से लगे है। 1580 किलोमीटर लंबी भारत नेपाल सीमा में दोनों तरफ के लोगों में कई समानताऐं देखी जा सकती है । मसलन रहन—सहन,खान—पान,बोली,भाषा इत्यादी । शादी,विवाह भी इन इलाकों में धड़ल्ले से और बिना किसी शंका उपशंका के की जाती रही है । इसलिए यहॉं हम बेटी रोटी जैसे रिश्तों का बखान करते है । ये लोग इसी भाषा और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए एक मधेश एक प्रदेश की मॉग हमेशा से करते रहे हैं। लेकिन हमेशा से पहाड़ डोमिनेन्ट राजनीति ने मधेश वासियों की इस मॉंग को खारिज किया है । जब लोगों ने देखा कि इनकी ये मॉंग सहज पूरी नहीं कि जा सकती है तो ये लोग थोड़ा नरम हुए । तराई मधेश क्षेत्र में दो प्रदेश की मॉंग मनवाई गई । लेकिन इसमें भी विरोध के स्वर तब उठने लगे जब दक्षिण पूर्व के तीन जिले मोंरगं , झापा और सुनसरी को मधेश का हिस्सा नहीं बनाया गया । ठीक ऐसा ही दक्षिण पश्चिम के कुछ जिलों को थारूवान का हिस्सा नहीं बनाया गया । जबकि इन जिलों में रहने वाले लोग थारू जनजाती के है । जिनकी अपनी भाषा और समृद्ध संस्कृति है । ठीक उसी तरह जैसा मधेश में रहने वाले मैथिली भोजपुरी भाषाई लोगों की है ।
दरअसल विरोध के स्वर यहीं से उठना शुरू हुआ । यही वजह है कि पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ यह विरोध हिंसा का स्वरूप ले लिया । इस हिंसा ने अभी तक 40 से ज्यादा लोंगों की जानें ले ली है। आब बात विरोध के हिंसक होने की । पश्चिम नेपाल के कैलाली में जहॉं संविधान के विरोध में उठी आवाज सबसे पहले हिंसा का रूप ले लिया । यहॉं प्रहरी या पुलिस पहाड़ मूल के होने की एक बड़ी वजह थी जो यह झड़प इतना बड़ा रूप ले लिया । आज भी पहाड़ और मधेश की विभेदकारी नीति कहीं ना कहीं गाहे बगाहे अपना सर उठा ही लेती हैै। इसकी एक झलक यहॉं के नागरीकता या सिटीजनशिप में भी देखने को मिलती है।
नेपाल में शुरू से ही दो तरह के नागरिकता का प्रावधान है। एक अंगीकृत तो दूसरा वंशज । आंगीकृत नागरिकता का अर्थ है कि नागरिकता लेने वाला व्यक्ति अपने आधार पर अपने बच्चों या पत्नी को नागरिकता नहीं दिला सकता है । जबकि वंशज नागरिकताधारी व्यक्ति के बच्चे भी अपने बाप के नागकिरता का आधार बनाकर अपना नागरिकता बनबा सकता है । अंगीकृत नागरिकता वाला कोई व्यक्ति वहां सर्वाच्च संवैधानिक पद मसलन राष्टपति, सेनाध्यक्ष या न्यायाधीश नहीं बन सकता है। इस तरह के अंगीकृत नागरिकता वाले अधिकांश लोग इन्हीं तराई क्षेत्रों में बसते है । पहले नियम था कि वशंज नागरिकता के लिए मॉं ओर पिता दोनों को नेपाली होना आवश्यक था। लेकिन मधेसियों के विरोध के बाद नए संविधान में यह नियम बदला गया है । अब नागरिकता के लिए मॉ या पिता शब्द जोड़ा गया है । यानि की मॉ या बाप में से कोई एक भी नेपाली है तो उसके बच्चे को नागरिकता लेले में कठिनाई नहीं होगी । लेकिन मधेश के लोग अंगीकृत नागरिकता वाले को भी सभी तरह के अधिकार और सभी पदों पर बैठने को अधिकार मॉंग रहे हैं । जिसे नए संविधान मेंं नहीं रखा गया है । मुख्य रूप से ये दो मॉंग एसे हैं जो इन लोगों के द्वरा मुख्य रूप से उठाया गया है । खासकर राज्यों के सीमांकन और नामांकन मख्य मुद्दा है ।
संविधान जारी होने के बाद अब सरकार के लिए यह एक चुनौती है कि नए संविधान को सहज रूप से लागू किया जा सके । तराई मधेश में फैली हिंसा को रोकना भी अभी सरकार का मुख्य दायित्व है । हालांकि इसके लिए वार्ता का वातावरण बनाया जा रहा है । लेकिन इसमें सफलता कितनी मिलेगी फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी ।