बुधवार, 26 अगस्त 2015

धधकता मधेश

पिछल दो सप्ताह से नेपाल के तराई क्षेत्र में हिंसा, बंद , आगजनी , हड़ताल और प्रदर्शन का क्रम जारी है। सोमवार को कैलाली के टीकापुर में जो हुआ वह प्रदर्शन के क्रम में किए गए हिंसा की चरम सीमा है । प्रदर्शनकारियों ने 17 से अधिक पुलिसकर्मियों को विभिन्न तरीके से मौत के घाट उतार दिया । बदले में सरकार ने सेना बुला ली और कर्फ्यु लागा दी । ना तो इस घटना के जड़ में जाने की सरकार ने जहमत उठाई, और ना ही समस्या के समाधान करने की कोई पहल । हॉं घटना की जॉंच के लिए एक कमेटी जरूर बना दी गई ।

नेपाल इन दिनों अपने संविधान निर्माण के दौर से गुजर रहा है। संविधान का प्रारभिंक मसौदा तैयार किया गया । कुछ बिंदुओ को छोड़कर लगभग अधिकांश मुद्दों पर प्रमुख तीन राजनीतिक दल कॉेग्रेस, एमाले और एमाओवादी सहमत दिखे । तराई को प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी मधशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक ने भी हॉं में हॉं मिलाई । इधर कुछ विरोध के बावजूद मसौदे में फेर बदल के बाद अब सात प्रदेश का खाका तैयार किया गया है । जिसे संविधान सभा में पेश भी कर दिया गया । बताते चलें कि इससे पहले मसौदे मे 6 प्रदेश के प्रारूप को शामिल किया गया था । एक तरफ संविधान सभा में मसौदे पर बहस शुरू हुई , तो दूसरी तरफ तराई मधेश में मसौदे का विरोध शुरू हुआ । तराई क्षेत्र को प्रतिनिधित्व करने वाले सभी मधेशी दल इस संविधान का विरोध कर रहें है। यही विरोध जब उग्र हुआ तो कैलाली की घटना ने जन्म लिया ।

नेपाल के 75 में से 22 जिला दक्षिणी क्षेत्र मधेश में आता है । यह क्षेत्र समतल भूमि वाला इलाक़ा है । इसलिए इसे तराई या मधेश कहा जाता है । क्योंकि समूचे नेपाल को भौगोलिक दृष्टीकोण से तीन हिस्सों में बॉंटा गया है । तराई,पहाड़ और हिमाल । नाम से ही आप इसका अर्थ लगा सकते है । बहरहाल हम बात कर रहे थे, तराई क्षेत्र की । दरअसल तराई वासी या मधेशी शुरू से ही एक मधेश एक प्रदेश की मॉंग कर रहे थे। लेकिन सरकार और प्रमुख राजनीतिक दल इस मॉंग को शुरू से ठूकरा रहें है । नतीजतन कुछ मधेशी दलों में सत्ता लोलुपता और आपसी फूट की वजह से यह मॉंग कमजोर होता गया । जिसका फायदा शीर्षस्थ राजनीतिक दलों ने उठाया। इसमें सांमती मानसिकता वाले कुछ ऐसे दल और नेता भी है, जो हमेशा से इन मेधशियों को दबा कुचला समझते आ रहे हैं। इन पर राज करने की इनकी मानसिकता आज भी व्याप्त है । दरअसल लड़ाई इसी मानसिकता को ख़त्म करने की है । लेकिन आपसी कलहबाजी और फूट ने इस लाड़ाई को समय समय पर कमजोर किया है ।

 नयॉं संविधान के मसौदे में तराई के कुछ जिले को बॉट कर दूसरे प्रदेश में शामिल किया गया है । कैलाली जो कि थारू बहुल इलाका है । भौगोलिक और जातिय पहचान मिटने के डर से यह समुदाय थारू प्रदशे की मॉंग पर अड़ा है । इनकी इस मॉंग को प्रस्तावित मसौदे मे संबोधन नहीं किया गया है । इसी का विरोध करने के लिए ये लोग कैलाली के टीकापुर में जगह जगह प्रदर्शन कर रहे थे । उग्र होते प्रदर्शन को जब पुलिस ने रोकना चाहा तब यह हिंसक रूप ले लिया । प्रदर्शनकारियों ने घरेलु हथियार से आक्रमण कर दिया । इस हमले मे एक एसएसपी स्तर के पुलिस सहित 17 पुलिसकर्मियों की जान चली गई । साथ ही तीन प्रदशकारी भी इस हमले में मारे गए । कुछ पुलिसकर्मी को विभत्स तरीके से आग लगा कर जला दिया गया । घटना के अगले दिन सरकार ने सेना का परिचालन कर स्थिति को काबू करने की कोशिश की । टीकापुर में कर्फ्यं लगा दिया गया। लोगों से शांती बनाए रखने की अपील की गई । लेकिन एसा नहीं है कि यह स्थिति सिर्फ टीकापुर की है। कमोबेश यही स्थिति तराई के एक दर्जन से अधिक जिलों में व्याप्त है । अधिकांश जिलों में कर्फ्यु और प्रदर्शन जारी है । जिसे थमने की आशंका फिलहाल तो नहीं लग रही हैं।

इस बीच सरकार ने कैलाली घटना की जॉंच के लिए एक आयोग का गठन कर खाना पूर्ति का काम कर दिया है एक और बात, आपको याद होगा जब माओवादी आन्दोलन नेपाल मे चल रहा था , तब मधेश के सभी सरकारी कार्यलयो पर श्री 5 सरकार को मिटा कर मधेश सरकार लिखा जाने लगा था एक बार फिर वही स्थिति थारू बहुल क्षेत्र में देखने को मिल रहा है थरूहट इलाक़े मे थारूवान स्वायत प्रदेश लिखने का सिलसिला शुरू हो गया । यकीनन नेपाल इस समय पहाड़ी और मधेशी विभेद नीति का शिकार हो रहा है । 90 के दशक में इस सुंदर देश के ​अस्थिर होने का बहुत बड़ा कारण यह विभेद नीति ही था। वर्तमान मे आलम यह हो गया कि पहाड़ी सरकारी कर्मचारी मधेश में काम करने से कतरा रहा है, और मधेशी कर्मचारी पहाड़ मे नहीं जाना चाहता है । स्थिति विकराल होन से पहले से इससे निपटना प्रधानमंत्री सुशील कोइराला सरकार के लिए एक चुनौती है । संविधान निर्माण के राह में यह चुनौती सबसे बड़ी बाधा है ।  अगर इस आग को यहीं नहीं बुझाया गया तो विश्व को शांति का संदेश देने वाले यह देश बुरी तरह अशांति की आग में झुलस जाएगा

तराई आज जल रहा हैं । प्रदर्शन की आग में आम नागरिक झुलस रहें है। लेकिन सरकार संविधान निर्माण की प्रक्रिया से पीछे नहीं हटने की अपनी प्रतिबद्धता जता चुकी है । ऐसे में जरूरी है कि तराई मधेश के दलों को वार्ता के टेबल पर बुलाकर एक बीच का रास्ता निकाल जाय । अगर ऐसा नहीं होता है तो संविधान जारी होने के बाद भी मधेश शांत हो जाएगा इसकी गायरंटी देना फिलहाल तो जल्दबाजी होगी । क्योंकि वर्षों से विभेदकारी नीति का शिकार तराई वासी इस मौक़े को एक सुनहरा अवसर के तौर पर देख रहें है ।

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