बुधवार, 15 दिसंबर 2010

शहर की सच्चाई

ये कौन से शहर में आ गए हम ,
अपने से है सारे पर लगते है बेगाने हम।
इससे तो भली थी गाँव हमारी ,
सुख दुःख में देते थे सब साथ हमारी ।
ये तो तमाशबीनों का है शहर ,
मतलबी है लोग यहाँ ,
मतलबों से है बस मतलब ।
शरीफों की यहाँ लूटती है शराफत ,
बेबस अबला की करे कौन हिफाजत ।
चिराग लेकर चलो ढूंढें ,
दबी जुबान में कहीं तो सुलगती होगी नफरत ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें